जननायक हेमाराम चौधरी: एक संघर्षशील जीवन की प्रेरणादायक गाथा #जननायक_हेमाराम_चौधरी

हेमाराम चौधरी की कहानी सच में रेगिस्तान की मिट्टी से निकले हीरे जैसी है। 18 जनवरी 1948, बायतु भीमजी गांव, बाड़मेर—यहीं से उनका सफर शुरू हुआ। उनके पिता, मूलाराम चौधरी, बस एक आम किसान थे। परिवार में साधारणपन था, लेकिन सोच बड़ी थी। बचपन में हेमाराम ने सूखा, पानी की तंगी, फसल बर्बादी—इन सबको नजदीक से झेला। इन मुश्किलों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बना दिया।

गांव में पढ़ाई पूरी की, तो बालोतरा पहुंचे। वहां इतिहास, संस्कृति, समाज—इन सबमें उनकी दिलचस्पी बढ़ गई। पंचायत की बैठकों में चुपचाप बैठकर बड़े-बुजुर्गों की बातें सुनते, और मन ही मन सोचते—इस सूखी ज़मीन को कैसे हराभरा करूं? मां की सीख भी हमेशा साथ रही—सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं। इन्हीं मूल्यों ने उनका व्यक्तित्व गढ़ा।

अब जरा सोचिए, एक बच्चा जो सुबह खेत में काम करता है, शाम को किताबें पढ़ता है, और रात को अच्छे कल के सपने देखता है। हेमाराम का बचपन कुछ ऐसा ही था। अमीर बनने के सपने नहीं देखे, बस गांववालों की खुशियां लौटाने की ठानी। पढ़ाई ने उन्हें ताकत दी, समझाया कि असली हथियार ज्ञान है—इसी से गरीबी और अन्याय से लड़ा जा सकता है। यही शुरुआत उनकी राजनीति की नींव बनी।

बाड़मेर में पानी की अहमियत क्या है, ये तो वहां का बच्चा-बच्चा जानता है। हेमाराम भी बचपन से जान गए थे कि पानी बचाना ज़रूरी है। उनके पिता हमेशा कहते, “पानी जीवन है, इसे बरबाद मत करो।” ये बातें बाद में उनके बड़े-बड़े फैसलों में झलकीं—नर्मदा नहर परियोजना इसका बड़ा उदाहरण है। इन सब से एक बात साफ है—बड़े नेता हालात से निकलते हैं, कोई पैदा नहीं होता।

अब राजनीति की बात करें। 1980—हेमाराम चौधरी ने पहली बार चुनाव लड़ा, गुड़ामालानी से, कांग्रेस के टिकट पर। पहली कोशिश में ही जीत गए, लेकिन ये जीत आसान नहीं थी। रेगिस्तान की राजनीति में जाति, पानी, खेती—इन्हीं मुद्दों पर लड़ाई होती है। हेमाराम लोगों के बीच पहुंचे, हर घर जाकर उनकी परेशानी सुनी। सादगी ऐसी कि साइकिल से चलते, चाय की दुकानों पर बैठकर कहते, “मैं आपका बेटा हूं, आपकी सेवा के लिए आया हूं।”

पहली जीत के बाद उनकी रफ्तार नहीं थमी। छह बार विधायक बने—ये जनता से उनके गहरे रिश्ते का सबूत है। 2003 में अशोक गहलोत सरकार में मंत्री बने—कभी परिवार कल्याण, कभी कृषि, तो कभी पर्यावरण। उनके लिए मंत्रीपद सिर्फ एक जिम्मेदारी थी, असली मकसद था लोगों की सेवा। हमेशा कहते, “राजनीति पद की नहीं, जनता की सेवा है।”

2007-08 में वे नेता प्रतिपक्ष बने—यहां उन्होंने सरकार से तीखे सवाल पूछे, खासकर किसानों के हक में। हेमाराम की असली ताकत ये थी कि विपक्ष में रहते हुए भी लोग उन्हें सत्ता पक्ष से ज्यादा पसंद करते थे। उनकी राजनीति की शुरुआत ही बता देती है कि सच्ची सेवा सबसे बड़ा हथियार है।

अब आते हैं उनके सफर के कुछ बड़े पड़ावों पर।

सबसे पहले—किसानों के लिए लगातार लड़ाई। बाड़मेर-जैसलमेर के सूखे इलाकों में नर्मदा नहर लाकर उन्होंने लाखों किसानों की जिंदगी बदल दी। MSP, सिंचाई, बिजली-पानी—हर मुद्दे पर डटकर लड़ाई लड़ी। सूखा पड़ा तो विधानसभा में धरना दिया, राहत पैकेज मंजूर करवाया। इस जिद ने उन्हें जाट समाज का बड़ा नेता बना दिया। सोशल मीडिया पर #जननायकहेमारामचौधरी के नाम पर लोग उनकी कहानियां शेयर करते हैं—कैसे वे खुद खेतों में जाकर पानी की दिक्कत का हल ढूंढ़ते थे। ये सिर्फ राजनीति नहीं, दिल से जुड़ाव है।

दूसरा—पर्यावरण और वन संरक्षण। मंत्री रहते उन्होंने लाखों पेड़ लगवाए, थार में हरियाली की कोशिश की। अवैध कटाई रोकने खुद मौके पर गए। आज भी लोग उनकी इन कोशिशों को याद करते हैं।

तीसरा—शिक्षा और युवा विकास। बाड़मेर में स्कूल, कॉलेज, छात्रावास—अपने पैसों से बनवाए। रिफाइनरी प्रोजेक्ट को लाने के लिए मेहनत की, ताकि युवाओं को रोजगार मिले। सोचिए, अपनी जमीन जनता को दान कर देना—ऐसी सादगी कम मिलती है।

चौथा—कैबिनेट मंत्री के तौर पर सुधार। 2008-13 में राजस्व मंत्री रहते भूमि विवादों के हल, किसानों को पट्टे, गरीबों को घर—ऐसे कई बड़े फैसले लिए। उनकी पत्नी भी छह बार सरपंच रहीं—यानि पूरा परिवार सेवा में लगा रहा।

हेमाराम चौधरी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हमेशा कहते हैं, “जनता का भरोसा, सत्ता से बड़ा है।”

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