
28 अक्टूबर 2026 की सुबह बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवात अर्णब आंध्र प्रदेश के तट से टकराया। पेड़ गिरे, बिजली गई, खेत पानी में डूबे और कुछ जगहों पर जान भी गई। यह लेख 29 अक्टूबर तक की उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। हालात अब भी बदल रहे हैं, इसलिए आँकड़े आगे बदल सकते हैं।
अर्णब कैसे बना?
यह इस साल उत्तर हिंद महासागर का पहला चक्रवात है। विकिपीडिया के मुताबिक यह सीज़न का आठवाँ डिप्रेशन और पहला चक्रवाती तूफ़ान है। इसकी शुरुआत 24 अक्टूबर को पूर्वी बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में हुई, जो कई दिन वहीं मंडराता रहा। फिर वह तेज़ी से ताक़तवर हुआ। उसी स्रोत के अनुसार अगले 24 घंटों में वह “अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान” बन गया और सीधे प्रायद्वीप के पूर्वी तट की ओर बढ़ा।
रेनव्यूअर के ट्रैकर में उसकी रफ़्तार का क्रम दिखता है। 26 अक्टूबर को उसने पहली श्रेणी का चक्रवात बनने की ताक़त पाई और 27 अक्टूबर को वह अपने चरम पर पहुँचा। उस रिकॉर्ड के अनुसार सबसे तेज़ रीडिंग श्रेणी 4 के बराबर थी, यानी करीब 222 किमी/घंटा की हवा और 940 मिलीबार का दबाव, काकीनाडा से लगभग 88 किमी दक्षिण-पूर्व में। ध्यान रहे कि यह अमेरिकी पैमाने की एक मिनट वाली गणना है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) तीन मिनट की औसत हवा गिनता है, इसलिए उसके आँकड़े कम दिखते हैं। विकिपीडिया में भी दोनों पैमाने दर्ज हैं: आईएमडी के हिसाब से अधिकतम हवा 155 किमी/घंटा और सबसे कम दबाव 973 हेक्टोपास्कल रहा।
लैंडफॉल: कहाँ और कैसे टकराया?
अल जज़ीरा के अनुसार अर्णब बुधवार तड़के आंध्र प्रदेश में दाख़िल हुआ। राजमार्गों पर पेड़ गिरे और बिजली आपूर्ति बाधित हुई। तूफ़ान की श्रेणी पर एबीसी न्यूज़ ने आईएमडी के हवाले से बताया कि इसे “अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान” की श्रेणी में रखा गया, जो आईएमडी के पैमाने पर तीसरी सबसे ऊँची श्रेणी है। अल जज़ीरा के मुताबिक अंदर की ओर बढ़ने पर उसे “गंभीर” श्रेणी में घटा दिया गया।
द वॉचर्स की रिपोर्ट के अनुसार तूफ़ान आंध्र प्रदेश-यानम तट पर, यानम के दक्षिण-पश्चिम में टकराया और आईएमडी ने लैंडफॉल के समय हवा की रफ़्तार 125 से 135 किमी/घंटा आँकी, जिसके झोंके 150 किमी/घंटा तक गए। एनडीआरएफ के डीआईजी एस.एस. सूदन ने भी बताया कि लैंडफॉल आंध्र प्रदेश के तटीय इलाक़े में यानम के दक्षिण में हुआ।
कुछ संकलनों में लैंडफॉल का स्थान नरसापुरम (पश्चिम गोदावरी ज़िला) के पास बताया गया है। यानम और नरसापुरम एक ही तटीय पट्टी में पड़ते हैं, इसलिए स्रोतों के बीच यह फ़र्क़ मामूली है।
नुकसान: अब तक की तस्वीर
जानहानि
यहाँ आँकड़े अलग-अलग मिलते हैं, इसलिए सावधानी चाहिए।
- एनडीआरएफ के महानिरीक्षक नरेंद्र सिंह बुंदेला के हवाले से रिपोर्टों में तीन लोगों की मौत की पुष्टि की गई और आंध्र प्रदेश को सबसे ज़्यादा प्रभावित बताया गया।
- अल जज़ीरा के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि इनमें से दो मौतें पेड़ गिरने और करंट लगने से हुईं।
- द वॉचर्स ने पीटीआई के हवाले से लिखा कि विशाखापत्तनम ज़िले में 53 वर्षीय एक व्यक्ति की मौत खेत की नाली के पास गिरे जीवित तार को छूने से हुई।
- विकिपीडिया के अपडेट में आगे जाकर सात लोगों की मौत और उत्तरी आंध्र के ज़िलों में सबसे ज़्यादा नुकसान की बात दर्ज है। यह एक लगातार बदलता संकलन है, इसलिए इसे आधिकारिक आँकड़ा न मानें।
कुल मिलाकर, शुरुआती आधिकारिक आँकड़ा तीन का है और बाद के संकलनों में ज़्यादा। अंतिम संख्या राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की घोषणा से ही पक्की होगी। एक दिलचस्प बात यह भी रही कि ओपन मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने शुरुआती बयान में कहा था कि कोई मौत नहीं हुई, लेकिन बाद के एनडीआरएफ अपडेट से पता चला कि जानकारी आने के साथ स्थिति बदल गई। आपदा में ऐसा अक्सर होता है।
घर, पेड़ और बिजली
अल जज़ीरा की रिपोर्ट में मुख्यमंत्री की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखी चिट्ठी का हवाला है। उसके अनुसार तेज़ बारिश और हवा ने कम से कम 180 घर तबाह किए, 220 पेड़ गिराए और कई इलाक़ों में बिजली आपूर्ति बाधित की। ट्रेनें और उड़ानें भी रद्द हुईं।
खेत और बारिश
आंध्र के कृष्णा और एनटीआर ज़िलों का हाल हंस इंडिया ने विस्तार से लिखा। रिपोर्ट के मुताबिक मछलीपट्टनम और विजयवाड़ा में जलभराव हुआ, निचले इलाक़े डूबे और कई मोहल्ले बिजली के बिना रहे। बारिश के आँकड़े भी दिए गए: कृष्णा ज़िले में औसतन 68.7 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि मछलीपट्टनम उत्तर और दक्षिण दोनों में 112.6 मिमी बारिश हुई।
फ़सल का नुकसान सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा। कृषि विभाग की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार केवल कृष्णा ज़िले में 35,273 हेक्टेयर की फ़सल प्रभावित हुई, जिसमें 34,864 हेक्टेयर धान की थी। कटाई के ठीक पहले का यह नुकसान किसानों के लिए भारी पड़ सकता है। विकिपीडिया के संकलन में पूरे उत्तरी आंध्र के लिए 80,000 हेक्टेयर से ज़्यादा फ़सल के नुकसान का ज़िक्र है, पर यह भी अनंतिम आँकड़ा है।
तैयारी: कैसे बचाई गई जानें?
इस तूफ़ान की एक अहम बात यह रही कि चेतावनी और निकासी समय पर हुई। एबीसी न्यूज़ के अनुसार आंध्र प्रदेश और ओडिशा में 1,80,000 से ज़्यादा लोग पहले ही सुरक्षित जगहों पर पहुँचाए गए थे, स्कूल बंद किए गए थे और ट्रेन-उड़ान सेवाएँ रद्द हुई थीं।
आंध्र की तैयारी के ब्योरे ये हैं:
- रेड अलर्ट: विकिपीडिया के अनुसार आईएमडी ने 26 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के सात ज़िलों में रेड अलर्ट जारी किया।
- मछुआरों की वापसी: उसी स्रोत में दर्ज है कि 26 अक्टूबर तक 30,000 से ज़्यादा मछली पकड़ने वाली नावें बंदरगाह लौट आईं।
- राहत शिविर: स्टेट्समैन के अनुसार एनडीआरएफ ने बताया कि 55,000 से ज़्यादा लोग निचले और तटीय इलाक़ों से निकाले गए और 39 एनडीआरएफ टीमें तैनात की गईं, जिनमें चार को हवाई मार्ग से पहुँचाया गया।
ओडिशा भी चौकस रहा। द वॉचर्स की रिपोर्ट में अधिकारी के हवाले से लिखा है कि राज्य में 2,037 आश्रय स्थल तैयार थे और 313 राहत टीमें तैनात की गई थीं। यहाँ एबीसी न्यूज़ की एक पंक्ति भी याद दिलाती है कि अक्टूबर 1999 का सुपर साइक्लोन, जिसमें लगभग 10,000 लोग मरे थे, ओडिशा की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है। उसके बाद से राज्य की आपदा तैयारी पर बहुत ज़ोर रहा है।
नेपाल में भी चेतावनी
असर सिर्फ़ तटीय भारत तक सीमित नहीं है। अल जज़ीरा के अनुसार नेपाल के अधिकारियों ने मंगलवार को पर्यटकों को ऊँचे पहाड़ी इलाक़ों में न जाने की चेतावनी दी, क्योंकि गुरुवार से शनिवार तक तेज़ बारिश, बर्फ़ीले तूफ़ान और हिमस्खलन की आशंका थी। एबीसी की रिपोर्ट में भी नेपाल द्वारा ट्रेकिंग परमिट रोकने का ज़िक्र है।
यह चिंता बेवजह नहीं। 2014 के चक्रवात हुदहुद के अवशेषों ने नेपाल में भारी बर्फ़ीला तूफ़ान पैदा किया था, जिसमें विकिपीडिया के अनुसार 43 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए, और ज़्यादातर हताहत अन्नपूर्णा क्षेत्र में हुए।
अब क्या होगा?
तूफ़ान अब ज़मीन पर कमज़ोर पड़ रहा है, पर ख़तरा ख़त्म नहीं हुआ। आने वाले दिनों में इन बातों पर नज़र रखें:
- बारिश और बाढ़: अंदरूनी इलाक़ों, नदी-नालों और निचली बस्तियों में पानी भरने का ख़तरा बना रहता है।
- बिजली बहाली: गिरे खंभों और तारों से करंट का ख़तरा है। टूटे तार को कभी न छुएँ।
- फ़सल का मुआवज़ा: किसानों के लिए सर्वे और राहत की घोषणा अहम होगी।
- सामुद्रिक चेतावनी: समुद्र कई दिन उफ़ान पर रह सकता है, इसलिए मछुआरों को जल्दबाज़ी में नहीं लौटना चाहिए।
- पहाड़ी इलाक़े: नेपाल और हिमालयी क्षेत्र की यात्रा फ़िलहाल टालना ही समझदारी है।
आम लोग क्या करें?
अगर आप प्रभावित इलाक़े में हैं या आपके परिजन वहाँ हैं, तो ये सामान्य सावधानियाँ काम आएँगी:
- सिर्फ़ आईएमडी और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सूचनाओं पर भरोसा करें, व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड पर नहीं।
- बाढ़ के पानी में चलने या गाड़ी चलाने से बचें।
- पेड़ों और बिजली के खंभों से दूर रहें।
- पीने का पानी उबालकर पिएँ, क्योंकि बाढ़ के बाद बीमारियाँ फैलती हैं।
- मदद चाहिए तो स्थानीय प्रशासन की आपदा हेल्पलाइन से संपर्क करें।
निष्कर्ष
चक्रवात अर्णब भले ही 1999 के सुपर साइक्लोन जैसा विनाशकारी साबित न हुआ हो, पर उसने फिर याद दिलाया कि बंगाल की खाड़ी के तूफ़ान कितनी जल्दी ताक़त पकड़ लेते हैं। इस बार समय पर चेतावनी, लाखों लोगों की निकासी और एनडीआरएफ की तैनाती ने जानहानि को काफ़ी हद तक सीमित रखा। असली नुकसान की गिनती, ख़ासकर खेतों और घरों की, आने वाले दिनों में सामने आएगी।
तब तक सबसे ज़रूरी बात यही है कि सरकारी सूचनाओं का पालन हो, अफ़वाहों से बचा जाए और ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचे।
अस्वीकरण: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। आपदा की स्थिति में हमेशा आईएमडी और राज्य प्रशासन की ताज़ा चेतावनियों का पालन करें।
